Accounting Important Terms

Accounting Important Terms

दोस्‍तो अगर आप Accounting सीखना चाहते है, या‍ फिर आपने अभी अभी Accounts को पढ़ना शुरू किया है। लेकिन आपकों Accounting की भाषा समझ में नही आती है, और उन सभी Accounting Terms को हिंदी में क्या कहते है और आखिर इनका क्या मतलब होता है। ऐसे में बहुत से Students को Confusion होता। आज हम इस पोस्‍ट में यही जानेगे की Accounting Important Terms क्या है और इनका मतलब क्‍या है।

Accounting Important Terms

1. Capital (पूँजी) :- Owner (मालिक) द्वारा Business मे लगाया गये पैसे को कैपिटल पूँजी कहते है। इसी राशि से व्यवसाय प्रारम्भ किया जाता है। इसे Equity भी कहते है।

पूँजी को दो भागों में विभाजित किया जाता है :-
1. Fixed capital (स्थिर पूँजी) :- सम्पत्तियों को प्राप्त करने के लिए जो धनराशि लगाई जाती है, वह स्थित पूँजी कहलाती है, जैसे – मशीनरी तथा संयंत्र का क्रय, भूमि तथा भवन का क्रय।
2. Working capital (कार्यशील पूँजी) :- Capital (पूँजी) का वह भाग जो व्यवसाय के दैनिक कार्यों के लिए इस्तेमाल होता है, कार्यशील पूँजी कहलाता है।

2. Transaction (लेनदेन) :- Transaction से आश्‍य Business में होने वाले लेन देन से है चाहे वह दो पक्षों के बीच में होने वाले लेन देन हो या फिर, किसी सामान अथवा सर्विस का  लेन देन हो।

3. Goods (मॉल) :- जिन वस्तुओं का कोई व्यापारी व्यापर करता है, वह उसका माल (Goods) कहलाता है, जैसे – यदि कोई व्यापारी कपडे़ का व्यापार करता है तो कपड़ा उसका Goods (मॉल) होगा। यदि लोहे का व्यापार करता है तो लोहे उसका माल कहलाएगा।

4. Discount (छूट) :- वह राशि है जो कि किसी बिजनेसमैन द्वारा प्रोडेक्‍ट की बिक्री को बढाने के लिए किसी प्रोडेक्‍ट पर दिया जाता है।

Discount दो प्रकार के होते है।
1. Trade Discount (व्यापारी बट्टा) :- यह Discount दुकानदार या बिजनसमैन द्वारा कस्‍टमर्स को वस्‍तुओं और सेवाओं पर दी गई राशि पर एक फिक्‍स परसेन्‍टेज का दिया जाने वाला Discount है। जैस की जब आप किसी दुकान से कपडा खरीदते है जिसकी कीमत 1000 रूपये है। और उसपर 20% का Discount है तो उस कपडे की कीमत 800 रूपये हो जाती है,और आप को 200 रूपये का Discount मिलता है। इसे हम Trade Discount कहते है।

2. Cash Discount (नकद बट्टा) :- यह सेलर द्वारा कस्‍टमर्स को दि जाने वाली वस्‍तुओं और सेवाओं की राशि पर पेमेंन्‍ट करने पर मिलता है। जैसे की आप किसी दुकान पर बल्‍क कपडे खरीदने जाते है। तो आपको बल्‍क में कपडे़ खरीदने कर कैश में पेमेंट करने पर कुछ रूपयों का Discount मिल जाता है। इसे हम Cash Discount कहते है।

5. Bad Debts (निकृष्ट ऋण ) :- जिन लोगो को सामान क्रेडिट (उधार) पर बेचें गए हो। उन्हे हम डेटर्स के नाम से जानते है। कभी कभी डेटर्स की बेईमानी या फिर मौत या दिवालियापन के कारण पूरा अमाउण्‍ट रिकवर नही हो पाता तब उसे ही Bad Debts कहते है।

6. Liability (दायित्व) :- वह, धन जो व्यापार के कारोबारी को दूसरों को देना है, दायित्व कहा जाता है। जैसे – लेनदार, देय बिल, Lone एवं अधिविकर्ष (Overdraft) इत्यादि।

Liability (दायित्व) के निम्नलिखित प्रकार है :-

1. Long Term/Fixed Liabilities (स्थायी दायित्व) :- दीर्घकालिक या स्थायी दायित्वों से अभिप्राय ऐसे दायित्वों से है जिनका भुगतान एक लम्बी अवधि के पश्चात होना है। उदाहरण के लिए ऋण-पत्र दीर्घकालिक ऋण, दीर्घकालिक जमाएँ।

2. Current Liabilities (चालू ऋण) :- चालू ऋण वे ऋण कहलाते हैं जिनका भुगतान अल्प अवधि में किया जाना है। जैसे देय विपत्र, विविध लेनदार, बैंक अधिविकर्ष, अदत्त व्यय आदि।

7. Assets (सम्पत्तियाँ) :- सम्पत्तियाँ से आशय उद्यम (Enterprise) के आर्थिक स्त्रोत (Financial resources) से है, जिन्हें मुद्रा में व्यक्त किया जा सकता है, जिनका मूल्य होता है और जिनका उपयोग व्यापर के संचालन व आय कमाने के लिए किया जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सम्पत्तियाँ (Assets) वे स्त्रोत्र हैं जो भविष्य में लाभ पहुँचाते हैं। उदाहरण के लिए, मशीन, भूमि, भवन, ट्रक, आदि। इस तरह सम्पत्तियाँ व्यवसाय के मूलयवान साधन (Valuable resources) हैं जिन पर व्यवसाय का स्वामित्व है।

सम्पत्तियों के निम्नलिखित प्रकार है :-

1. Fixed Assets (स्थायी सम्पत्तियाँ) :- स्थायी सम्पत्तियों से आशय उन सम्पत्तियों से है जो व्यवसाय में दीर्घकाल अर्थात लम्‍बे वक्‍त तक रखी जाती हैं।  और जिन्‍हे दोबारा बेचा नही जाता है। उदाहरण – भूमि, भवन, मशीन, उपकरण आदि।

2. Current Assets (चालु सम्पत्तियाँ) :- चालु सम्पत्तियाँ से आशय उन सम्पत्तियों से है जो व्यवसाय में पुनः विक्रय (Sales) के लिए या अल्पावधि (कुछ समय बाद) में रोकड़ (Cash) में परिवर्तित करने के लिए रखी जाती हैं। इसलिए इन्हें चालू सम्पत्तियाँ, चक्रीय सम्पत्तियाँ और परिवर्तनशील सम्पत्तियाँ भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए देनदार, पूर्वदत्त व्यय, स्टॉक, प्राप्य बिल, आदि।

3. Intangible Assets(अमूर्त सम्पत्तियाँ) :- अमूर्त सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ हैं जिनका भौतिक अस्तित्व नहीं होता है, किन्तु मौद्रिक मूल्य होता है। उदाहरण – ख्याति, ट्रेड मार्क, पेटेण्ट्स, इत्यादि।

4. मूर्त सम्पत्तियाँ (Tangible Assets) :- मूर्त सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ हैं जिन्हें देखा तथा छुआ जा सकता हो अर्थात जिनका भौतिक अस्तित्व हो। उदाहरण – भूमि, भवन, मशीन, संयंत्र, उपस्कर, स्टॉक, आदि।

5. क्षयशील सम्पत्तियाँ (Wasting Assets) – क्षयशील सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ हैं जो प्रयोग या उपभोग के कारण घटती जाती हैं या नष्ट हो जाती हैं। उदाहरण – खानें, तेल के कुँए, आदि।

8. Debtors देनदार :- वे व्यक्ति, संस्था, फर्म, कम्पनी या निगम, आदि जिनसे धन वसूलना रहता है। अथवा जिनके पास संस्था की राशि देय है, उन्हें देनदार (Debtor) कहा जाता है। क्‍योकि वह फर्म के पैसों का देनदार/कर्जदार रहता है।

9. Stock (भण्डार) :- यह किसी व्‍यवसाय के अंतर्गत उपल्‍बध माल, स्‍पेयर्स और अन्‍य आइटम्‍स जैसी चीजों का पौमाना है। इसे क्‍लोजिंग स्‍टॉक भी कहा जाता है। किसी व्‍यापार के अंतर्गत स्‍टॉक ऑन हैड माल की मात्रा होती है। जिसे बैलेस शीट तैयार करने की दिंनाक तक बेचा नही गया होता है इसे क्‍लोजिग स्‍टॉक भी कहा जाता है किसी विनिर्माण कम्‍पनी के अंतर्गत क्‍लोजिंग स्‍टॉक में यह कच्‍चा माल, आधा तैयार माल और पूरी तरह तैयार माल शामिल किया जाता है जो क्‍लोजिग डेट पर हाथ में उपलब्‍ध रहता है। इसी प्रकार से, अकाउंटिग ईयर के प्रारंभ में स्‍टॉक की मात्रा को ओपनिंग स्‍टॉक कहा जाता है।

10. Receivables (प्राप्तिया) :- यह वह अमाउण्‍ट है जो फर्म को रिसीव करना है। इसमें वह अमाउण्‍ट शामिल नही है जो डेटर्स (Debtors)से लेना है।

11. Creditors (लेनदारों) :- जिस व्‍यक्ति से हम उधार माल खरीदते है, उसे हम क्रेडिटर कहते है।

12. Payables (देय) :- जब कोई Company किसी Suppliers (आपूर्तिकर्ताओं)या Vendors (विक्रेताओं) से Credit Basis पर कोई भी Goods या सेवा खरीदता है, और उसका Payments अभी तक Clear नहीं हुआ होता है। अर्थात अभी तक वह पैसा नहीं चुकाया गया है उसे account payable कहा जाता है| जो की Paying Account में जोड़ा जाता है।

13. Losses (हानि) :- Losses का अर्थ है जिससे फर्म को कोई भी लाभ प्राप्‍त नही हुआ है जैसे की चोरी।

14. Proprietor Proprietorship (एकल स्वामित्व) :- Proprietor Proprietorship को एकल स्वामित्व (Sole Proprietorship) भी कहते है। इसका अर्थ है एक व्यक्ति का स्वामित्व। एक ही व्यक्ति बिजनेस/व्यवसाय/व्यापार का स्वामी होता है। व्यापार से संबंधित सभी काम और नियंत्रण उसके हाथ में होते है। Proprietor Proprietorship (एकल स्वामित्व) का लक्ष्य लाभ कमाना होता है। हानि होने पर स्वामी (Owner) को नुकसान उठाना पड़ता है। लाभ होने पर उसे फायदा होता है। वह अपने सभी संसाधनों को योजनाबद्ध तरह से व्यवस्थित करता है।

15. Drawings :- व्‍यापार का मालिक अपने व्‍यक्तिगत खर्च के लिए जो रूपया व्‍यापार से खर्च करता है या निकालता है वह Drawings (आहरण) कहलाता है, जैसे किसी ने अपने व्‍यापार के रूपयों से निजी उपयोग के लिए धन निकालता है तो वह आहरण कहलाता है।

16. Expense (व्यय) :- आगम की प्राप्ति के लिए प्रयोग की गई वस्तुओं एवं सेवाओं की लागत को व्यय कहते हैं। व्यय के उदाहरण – विज्ञापन व्यय, कमीशन, ह्रास, किराया, वेतन, आदि।

17. Revenue :- आगम से आशय व्यवसाय की आय से है। इसका अभिप्राय नियमित रूप से प्राप्त होने वाली आय या आवर्ती प्रकृति की आय से भी है। आगम से पूँजी में अभिवृद्धि (Growth) होती है। आगम का उदाहरण – माल के विक्रय से प्राप्तियाँ, अर्जित ब्याज, अर्जित कमीशन, अर्जित किराया, अर्जित लाभांश, अर्जित बट्टा, आदि।

18. Income :- आगम में से व्यय घटाने पर जो शेष बचता है, उसे आय (Income) कहा जाता है।

19. Gain (लाभ) :- जो कि हमारी ट्राजेक्‍सन रोज रोज की नही होती है। उससे जो भी हमारा प्राफिट जनरेट होता है वो हो गया हमारा गेन होता है।

20. Purchases (खरीद) :- बिजनेस के द्वारा बेचने के लिए या यूज के लिए खरीदा गया गुड्स Purchases कहलाता है। Purchases कैश अथवा क्रेडिट बेसिस पर हो सकता है। क्रेडिट के केस में पेमेन्‍ट भविष्‍य की तारिख में किया जाता है।

21. Sales (बिक्री) :- यह बिजनेस के द्वारा बेचा गया गुडस होता है। Sales कैश या क्रेडिट में हो सकती है। क्रेडिट के केश में कस्‍टमर तुरन्‍त कैश पे नही करता, लेकिन भविष्‍य में पे करने का वादा करता है।

22. Gross Profit (सकल लाभ) :- किसी भी निर्माण में लगी लागत पे आय की अधिकता सकल लाभ अर्थात Gross profit कहलाता है। ये लाभ व्यापर के खाते द्वारा पता चलता है। सकल लाभ को निकालने के लिए निर्माण लागत में उत्पाद का क्रय मूल्य और प्रत्यक्ष व्यय को जोड़ कर उस चीज को कितने में बेचा गया है उसमे से घटाने के बाद जो बचत होती है उसे ही हम ग्रॉस प्रॉफिट या सकल लाभ कहते है। सकल लाभ का उदाहरण – माना की आपकी कम्पनी ने एक साईकिल 1000 रुपए की लागत में बनाया। जिसमे लागत का मतलब (रॉ मटेरियल तथा उसकी बनवाई पे लगी मजदूरी) है। और आपने उसे 2000 रुपए में बेचा। तो आप कह सकते हैं कि (2000 रुपए (विक्रय मूल्य) -1000 (कुल लागत) = 1000 रुपए (सकल लाभ)) जिसमे आपका ग्रॉस प्रॉफिट 1000 रुपए मिला।
Gross Profit = Net Sales – Cost of Goods Sold

23. Net Profit (शुद्ध लाभ) :- शुद्ध लाभ या Net profit का मतलब होता है कि निर्माण में जितना भी व्यय हुआ हो चाहे वह डायरेक्ट हो या Indirect उन्हें जोड़ के जो निर्माण की लागत बनी उसे बेचने के बाद मिले धनराशि से पूरी लागत को घटाने के बाद जो अधिक राशि बची वो नेट प्रॉफिट कहलाती है। जैसे की यदि आपका कैलकुलेटर 100 रुपए की लागत में बना जिसमे केवल रॉ मटेरियल तथा उसकी बनवाई पे लगी मजदूरी जुड़ी है तो इसमें बाकी लागत भी जोड़ी जाएगी जैसे बिजली का खर्च, ट्रांसपोर्ट आदि जिसके बाद इसकी लागत बढ़ के 120 रुपए की हो गयी जिसे आपने 150 रुपए में बेचा। तो इसपे आपका शुद्ध लाभ 30 रुपए हुआ।
Net Profit = Gross Profit – Operating and Non – operating Expenses + Non-operating Incomes

24. Equity :- Equity का सीधी और सरल भाषा में मतलब है, कंपनी में मालिक और निवेशक का कंपनी में पैसा। इसे कंपनी में मालिक और निवेशक की हिस्सेदारी भी कह सकते है। जैसे अगर किसी कंपनी में मालिक ने अपने 60 लाख रुपए लगाए है, और कंपनी की कुल कीमत 1 करोड़ रुपए है। और बाकि की राशि के लिए क़र्ज़ लिया गया है, तो उस कंपनी में मालिक की हिस्से दारी 60 % है, जिसे Equity कहेंगे। अब अगर मालिक 40 लाख के क़र्ज़ के बजाए किसी रिश्तेदार से Partnership कर के उससे 40 लाख रुपए ले तो कंपनी की Equity 100 % होगी। जिसमे मालिक की हिस्सेदारी 60 % और दूसरे Partner की हिस्सेदारी 40 % होगी।

25. Inventory :- सेल के लिए तैयार किए जा रहे आईटम का रॉ मटेरियल तथा अन्‍य आईटम होता है। इनवेन्‍टरी करेन्‍ट एसेटस्‍स होते है। क्‍योकि यह सेल होने पर कैश में बदलता है। इनवेन्‍टरी के टाईप्‍स है रॉ मटेरियल, फिनिश्ड गुडस आदि।

26. Vouchers :- ट्रांजैक्‍शन का लिखित प्रूफ वाउचर होता है।

वाउचरर्स निम्‍नलिखित प्रकार के होते है।
1. Invoice or Bill :– इन्‍वाइस वाउचर क्रेडिट ट्रांजैक्‍शन्‍स के लिए उपयोग होता है, तथा इन्‍वेण्‍ट्री रिकार्ड रखने से संबंधित होता है।
2. Cash Memories or Receipt :– केश मेमों या रिसीट का उपयोग केश ट्रांजैक्‍शन्स रिकॉर्ड करने में होता है।

NOTE:- आपको ये पोस्ट कैसी लगी आप हमें कमेंट के माध्यम से अवश्य बतायें। हमें आपके कमेंट्स का बेसब्री से इन्तजार रहेगा है। अगर आपका कोई सवाल या कोई suggestions है तो हमें बतायें, और हाँ पोस्ट शेयर जरूर करें।

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